नैनीताल

5 नवंबर को रमा एकादशी व गोवत्स द्वादशी का संयोग, जानें व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

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5 नवंबर को रमा एकादशी व गोवत्स द्वादशी का संयोग, जानें व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

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नैनीताल। कार्तिक मास में इस बार 5 नवंबर 2026, गुरुवार को रमा एकादशी व्रत और गोवत्स द्वादशी पर्व एक ही दिन मनाए जाएंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रमा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है, जबकि गोवत्स द्वादशी पर गाय और बछड़े की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इस संबंध में ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी, गेठिया (नैनीताल) ने पंचांग की जानकारी देते हुए पर्व के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला।

प्रातः 10:10 बजे तक एकादशी तिथि

पंडित प्रकाश जोशी के अनुसार, 5 नवंबर को एकादशी तिथि प्रातः 10:10 बजे तक रहेगी, इसके बाद द्वादशी तिथि प्रारंभ होगी। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रात्रि 3:56 बजे तक रहेगा, जबकि वैधृति योग अगले दिन प्रातः 5:09 बजे तक रहेगा। बालव करण प्रातः 10:36 बजे तक रहेगा। चंद्रदेव प्रातः 9:34 बजे तक सिंह राशि में रहेंगे, इसके बाद कन्या राशि में प्रवेश करेंगे।

रमा एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने, मन की शुद्धि और पापों से मुक्ति की कामना के लिए किया जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं, भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं तथा व्रत कथा का श्रवण और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

गोवत्स द्वादशी पर गाय और बछड़े की पूजा कर सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और मंगलकामना की जाती है। इस पर्व में गौसेवा और धार्मिक आस्था का विशेष महत्व है।

राजा मुचकुंद और शोभन की है रमा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में मुचकुंद नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनकी पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन से हुआ था। एक बार शोभन अपने ससुराल आया तो उसी समय रमा एकादशी का व्रत पड़ा। राजा के राज्य में एकादशी के दिन किसी को भी भोजन करने की अनुमति नहीं थी। यह नियम सुनकर शोभन चिंतित हुआ, क्योंकि वह शारीरिक रूप से दुर्बल था। हालांकि, पत्नी चंद्रभागा के समझाने पर उसने व्रत रखने का संकल्प लिया।

कथा के अनुसार, व्रत के दौरान भूख-प्यास से पीड़ित होने के बाद शोभन के प्राण निकल गए। लेकिन रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसे मंदराचल पर्वत पर एक सुंदर और वैभवशाली दिव्य नगर प्राप्त हुआ।

कुछ समय बाद सोम शर्मा नामक ब्राह्मण ने शोभन को उस नगर में देखा और उसकी पत्नी चंद्रभागा को पूरी घटना बताई। चंद्रभागा ने अपने वर्षों से किए गए एकादशी व्रत के पुण्य के प्रभाव से पति के दिव्य नगर को स्थिर बनाने का संकल्प लिया। कथा के अनुसार, ऋषि वामदेव के आशीर्वाद से उसे दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ और वह अपने पति के पास पहुंच गई। इसके बाद दोनों सुखपूर्वक रहने लगे।

धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से रमा एकादशी का व्रत करने तथा इसकी कथा सुनने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

आलेख: ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी, गेठिया, नैनीताल।

प्रकाशन से पहले ध्यान दें: पंचांग के समय स्थानीय गणना के अनुसार कुछ मिनट अलग हो सकते हैं। उपलब्ध पंचांगों में भी गोवत्स द्वादशी की तिथि और पर्व-पालन में क्षेत्रीय अंतर मिलता है। इसलिए दोनों पर्व एक ही दिन मनाए जाने की जानकारी को स्थानीय पंचांग से अंतिम रूप से मिलाना उचित होगा।

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