नैनीताल

वन्यजीव सप्ताह में गूंजा प्रकृति संरक्षण का संदेश, प्रो. ललित तिवारी बोले—जैव विविधता ही हमारा भविष्य

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नैनीताल। वन्यजीव सप्ताह के अंतर्गत भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान में “नेचर कंजर्वेशन एंड वाइल्ड लाइफ” विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम में कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ललित तिवारी ने मुख्य वक्ता के रूप में जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन पर विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रो. तिवारी ने कहा कि वनस्पति और प्राणी जगत से मिलकर बनी जैव विविधता का पर्यावरण से संबंध ही हमारे भविष्य की आधारशिला है। जैव विविधता का संरक्षण केवल वन्यजीवों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा विषय है।

उन्होंने कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हमें सतत विकास, समान भागीदारी और जैव विविधता के संरक्षण का संदेश देता है। उन्होंने जैव विविधता के मूल्य और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर भी विस्तार से जानकारी दी।

प्रो. तिवारी ने बताया कि हिंदूकुश पर्वत क्षेत्र से निकलने वाली प्रमुख नदियां अरबों लोगों के लिए जल, भोजन और ऊर्जा का आधार हैं। उन्होंने कहा कि वन्यजीव हमारे जीवन में सांस्कृतिक, नैतिक, पारिस्थितिक, वैज्ञानिक, मनोरंजक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने भारतीय संस्कृति में वन्यजीवों के महत्व को उदाहरणों के साथ समझाया। भगवान शिव के साथ नाग और नंदी, मां दुर्गा के साथ सिंह, मां सरस्वती के साथ हंस, मां लक्ष्मी के साथ हाथी, भगवान विष्णु के साथ शेषनाग, भगवान गणेश के साथ मूषक और भगवान कृष्ण के साथ गाय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ने सदियों से प्रकृति और जीव-जंतुओं को अपने जीवन-दर्शन का हिस्सा बनाया है।

उन्होंने खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकृति में प्रत्येक जीव की अपनी भूमिका है। पक्षी, गिलहरी और अन्य जीव पौधों के बीजों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जबकि परागण की प्रक्रिया में पक्षियों और कीटों का विशेष योगदान रहता है। उन्होंने कहा कि कला, चित्रकारी और भारतीय पारंपरिक ज्ञान में भी जीव-जंतुओं की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही है।

प्रो. तिवारी ने ऋग्वेद, रामायण, महाभारत और मेघदूत जैसे ग्रंथों में प्रकृति और पर्यावरण के वर्णन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में सूर्य, चंद्रमा, वर्षा, नदियों, पौधों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की भावना प्राचीन काल से रही है। उन्होंने सेक्रेड ग्रोव्स, टोटेमिज्म और खेजड़ी वृक्ष जैसे उदाहरणों को भी प्रकृति संरक्षण की भारतीय परंपरा से जोड़ा।

उन्होंने देश में मौजूद बायोस्फीयर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, टाइगर रिजर्व, कम्युनिटी रिजर्व और कंजर्वेशन रिजर्व के माध्यम से किए जा रहे संरक्षण प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण के लिए कानूनों के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी जरूरी है। स्थानीय स्तर पर और प्राकृतिक आवासों के बाहर संरक्षण के सिद्धांतों को अपनाकर जैव विविधता को सुरक्षित किया जा सकता है।

कार्यक्रम के दौरान प्रो. ललित तिवारी को पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यशाला में डिप्टी डायरेक्टर स्वाति, ममता चंद, रेंज ऑफिसर आर्य, मनोज साह, डॉ. रजनी, डॉ. हिमांशु, डॉ. भारद्वाज, पर्यावरणविद् जगदीश नेगी सहित विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थी मौजूद रहे।

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