
कदली वृक्षों के नगर भ्रमण से गूंजा नैनीताल, जय नंदा-सुनंदा के जयकारों से भक्तिमय हुआ सरोवर नगरी का माहौल
मंगोली में विधि-विधान से पूजन के बाद निकली भव्य शोभायात्रा, मां नयना देवी मंदिर में हुई परंपरागत पूजा
नैनीताल। Khabri Daju। श्री नन्दा देवी महोत्सव के दूसरे दिन कदली वृक्षों के नगर भ्रमण के साथ पूरा नैनीताल मां नंदा-सुनंदा की भक्ति में डूबा नजर आया। मंगोली गांव में विधि-विधान से कदली वृक्षों का पूजन कर जड़ सहित दो कदली पौधे लिए गए। इसके बाद उसी भूमि पर 21 पौधों का रोपण किया गया। पूजन अनुष्ठान पंडित भगवती प्रसाद जोशी ने संपन्न कराया।
मंगोली से कदली वृक्षों को सुखताल लाया गया, जहां विधिवत पूजन के बाद इन्हें तल्लीताल स्थित मां वैष्णवी देवी मंदिर पहुंचाया गया। यहां कदली वृक्षों का भव्य स्वागत और पूजन किया गया। श्रद्धालुओं ने अक्षत अर्पित कर मां का आशीर्वाद मांगा।
इसके बाद छोलिया दल और बैंड की धुनों के बीच कदली वृक्षों का नगर भ्रमण शुरू हुआ। “जय नंदा-सुनंदा” के जयकारों से सरोवर नगरी गूंज उठी। बड़ी संख्या में महिलाओं ने शोभायात्रा में भागीदारी की और नंदा स्तुति व भजनों की प्रस्तुति दी।
तल्लीताल धर्मशाला से शुरू हुई कदली यात्रा मालरोड होते हुए चीना बाबा मंदिर और श्री राम सेवक सभा भवन पहुंची। इसके बाद मल्लीताल बाजार से होते हुए कदली वृक्ष मां नयना देवी मंदिर परिसर पहुंचे। यहां मां नयना देवी की तीन परिक्रमा कर परंपरानुसार पूजन किया गया। शोभायात्रा में आगे सफेद और पीछे लाल ध्वज रहा।
कदली यात्रा में नगर के विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। मां नयना देवी मंदिर पहुंचने पर श्रद्धालुओं को हलवे और आलू का प्रसाद वितरित किया गया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार कदली वृक्ष मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। इसी कदली के आधार से लोक पारंपरिक कलाकार शुक्रवार को मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण शुरू करेंगे। कदली को भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की उपस्थिति से जुड़ा पवित्र माना जाता है।
नगर भ्रमण के दौरान जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी कदली वृक्षों को कंधा देकर परंपरा में सहभागिता की। श्रद्धालुओं की भारी मौजूदगी और जयकारों से नैनीताल का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा।
श्री राम सेवक सभा की ओर से आयोजित नन्दा देवी महोत्सव नैनीताल की धार्मिक आस्था और कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख पर्व है। कदली यात्रा वर्षों पुरानी परंपरा को जीवंत रखने के साथ नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी बनी हुई है।
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