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हरेला: प्रकृति संरक्षण और हिमालयी संस्कृति का जीवंत संदेश , विशेष लेख : डॉ. ललित तिवारी

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विशेष लेख | डॉ. ललित तिवारी

उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख लोकपर्व हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, कृषि और सामाजिक समरसता का जीवंत संदेश है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है।

‘हरेला’ का अर्थ है हरियाली। यह पर्व वर्ष में तीन बार—चैत्र, श्रावण और आश्विन मास में मनाया जाता है। इनमें श्रावण मास का हरेला सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सावन से नौ दिन पहले पाँच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं और श्रावण के प्रथम दिन उन्हें काटकर पूजा की जाती है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग हरेला सिर पर रखकर बच्चों और परिजनों को दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।

लोकमान्यताओं के अनुसार सावन के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी कारण हरेला को शिव-पार्वती के मंगल मिलन और हरियाली के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। इस अवसर पर मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की प्रतिमाएँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डीकारे’ कहा जाता है, बनाकर पूजा की जाती है।

हरेला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश पर्यावरण संरक्षण है। इस अवसर पर पौधारोपण किया जाता है और लोगों को जल, जंगल एवं जमीन के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग कम करने, मिट्टी का कटाव रोकने, भूजल स्तर बढ़ाने तथा जैव विविधता को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख भी है।

आज जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस पर्व पर कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प ले, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक बड़ा कदम होगा।

हरेला उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित और समृद्ध रहेगा।

हरेला का पारंपरिक आशीर्वाद

“जी रया, जागि रया।
दूबक जस जड़ हैजो, पात जस फैल हैजो।
स्यालक जस बल हैजो।
हिमालय में ह्यूँ छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”

—साभार -डॉ. ललित तिवारी

खबरी दाज्यू (KhabriDaju.com)
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