जंगल की आग से सबसे ज्यादा जूझती हैं पहाड़ की महिलाएं, काव्या पांडे के शोध ने दुनिया के सामने रखी उत्तराखंड की हकीकत
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की संगोष्ठी में काव्या ने प्रस्तुत किया शोध, वनाग्नि के दौरान महिलाओं के अदृश्य श्रम और संघर्ष को दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान
नैनीताल। उत्तराखंड के जंगलों और पर्वतीय महिलाओं के बीच गहरे संबंध तथा वनाग्नि के दौरान महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को लेकर रानीबाग निवासी शोध छात्रा काव्या पांडे ने महत्वपूर्ण शोध किया है। उनके शोध ने न केवल पर्वतीय महिलाओं के संघर्ष और योगदान को सामने रखा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड का नाम भी रोशन किया है।
बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज से शोध कार्य कर रहीं काव्या पांडे को यूके के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष संगोष्ठी में अपना शोध प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस संगोष्ठी में विश्वभर से चयनित 32 मेधावी प्रतिभागियों में काव्या भी शामिल रहीं। भारत से केवल छह छात्रों को इस प्रतिष्ठित अवसर के लिए चुना गया था।
पर्वतीय महिलाओं के संघर्ष को मिली वैश्विक पहचान
काव्या पांडे ने “वन जीवन के संदर्भों में लैंगिक संवेदनशीलता और महिलाओं का नेतृत्व: मध्य भारतीय हिमालय से प्राप्त अंतर्दृष्टि” विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। अपने शोध के माध्यम से उन्होंने बताया कि उत्तराखंड में जंगल की आग का सबसे प्रतिकूल प्रभाव पर्वतीय महिलाओं के जीवन पर पड़ता है।
शोध के अनुसार पहाड़ों में ग्रामीण महिलाओं का जंगलों से सीधा और गहरा जुड़ाव है। महिलाएं परिवार के लिए जलावन की लकड़ी और पशुओं के लिए चारा जुटाने के लिए प्रतिदिन घंटों जंगलों में बिताती हैं। ऐसे में वनाग्नि की घटनाओं के दौरान उनके सामने जोखिम और बढ़ जाता है।
काव्या ने अपने अध्ययन में वनाग्नि के दौरान महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कठिन श्रम और उससे जुड़ी ‘अदृश्य लागत’ को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि जंगल की आग से निपटने और पर्यावरण संरक्षण की नीतियों में महिलाओं की भागीदारी तथा लैंगिक समानता को प्राथमिकता दिया जाना जरूरी है।
फायर वॉचर की भूमिका में भी असमानता
अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि जंगल की आग पर नजर रखने के लिए नियुक्त किए जाने वाले फायर वॉचर में अधिकांश पुरुष होते हैं। वहीं, वनाग्नि से निपटने में महिला अधिकारियों और ग्रामीण महिलाओं की भूमिका को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता। काव्या के शोध में वन प्रबंधन में महिलाओं को अधिक अवसर देने और उनके अनुभवों को नीति निर्माण का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है।
जंगल से महिलाओं का जुड़ाव बना जोखिम का कारण
पारंपरिक रूप से घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ जंगल से जुड़ा दैनिक श्रम भी महिलाओं के हिस्से आता है। यही कारण है कि वनाग्नि का असर केवल जंगल और पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य, श्रम और रोजमर्रा के जीवन को भी प्रभावित करता है।
काव्या का मानना है कि ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी को मजबूत कर वनाग्नि की रोकथाम और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रभावी नीतियां तैयार की जा सकती हैं। उनके शोध से भविष्य में वनाग्नि प्रबंधन में स्थानीय महिलाओं के अनुभव और नेतृत्व को बेहतर ढंग से शामिल करने की दिशा में नई संभावनाएं पैदा होती हैं।
डीएसबी परिसर से हासिल की वानिकी की शिक्षा
काव्या पांडे ने अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा वानिकी विषय में कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर, नैनीताल से पूरी की है। वर्तमान में वह बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज से अपना शोध कार्य कर रही हैं।
काव्या का कहना है कि उनका शोध ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने और भविष्य में वनाग्नि की रोकथाम के लिए नई एवं प्रभावी नीतियां बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
परिजनों और क्षेत्रवासियों में खुशी
काव्या की इस उपलब्धि पर उनके परिजनों ने गर्व और हर्ष व्यक्त किया है। परिजनों का कहना है कि काव्या ने अपनी मेहनत, लगन और शोध के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड का नाम रोशन किया है। क्षेत्र के गणमान्य लोगों ने भी काव्या को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
काव्या पांडे की यह उपलब्धि पहाड़ की बेटियों की प्रतिभा, मेहनत और शोध क्षमता का भी उदाहरण है, जिन्होंने स्थानीय समस्याओं को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का काम किया है।
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