नैनीताल शिक्षा

भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की भूमिका पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, महिला सशक्तिकरण और समावेशी विकास पर हुआ मंथन

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नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के माता जिया रानी महिला अध्ययन केंद्र की ओर से शनिवार को देवदार हॉल, एमएमटीटीवी (हार्मिटेज) में “भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की भूमिका : समावेशी विरासत और समकालीन सशक्तिकरण” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में देशभर से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के योगदान, उनकी बौद्धिक विरासत और वर्तमान समय में उनके सशक्तिकरण पर विचार साझा किए।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय, नैनीताल के विद्यार्थियों ने स्वागत गीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।

मुख्य अतिथि नैनीताल विधायक सरिता आर्या ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं का योगदान सदैव महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की प्रतिभा, नेतृत्व क्षमता और ज्ञान को अकादमिक तथा नीतिगत विमर्श में उचित स्थान मिलना समय की आवश्यकता है।

विशिष्ट अतिथि एवं दर्जा राज्य मंत्री शांति मेहरा ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और भारतीय संस्कृति एवं प्राचीन ज्ञान के संरक्षण से ही भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. मधुलिका बनर्जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की बौद्धिक विरासत, ज्ञान-सृजन और समकालीन भारत में समावेशी विकास में उनकी भूमिका पर विस्तृत व्याख्यान दिया।

माता जिया रानी महिला अध्ययन केंद्र की निदेशक प्रो. नीता बोरा शर्मा ने संगोष्ठी के उद्देश्य और इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

इस अवसर पर प्रो. ऋषिपाल, समाजसेवी एवं उद्यमी उपासना बोरा तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज्योतिषाचार्य नंदिता पांडे ने भी अपने विचार रखे। नंदिता पांडे ने भारतीय ज्योतिष को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का अभिन्न हिस्सा बताते हुए इसके वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। वहीं उपासना बोरा ने कहा कि आज महिलाएं आत्मनिर्भर बनकर रोजगार देने वाली की भूमिका निभा रही हैं।

संगोष्ठी के अंतर्गत दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों से आए लगभग 25 शोधार्थियों एवं सहायक आचार्यों ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। शोध-पत्रों में महिला अध्ययन, भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, लैंगिक समानता, शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और समकालीन महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा हुई।

कार्यक्रम के दौरान महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए एडवोकेट सुशील शर्मा और पल्लवी बहुगुणा को शॉल ओढ़ाकर एवं प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया गया।

समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. ललित तिवारी ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराएं केवल ज्ञान का स्रोत नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देती हैं। समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए तथा अतिथियों को शॉल और पौधा भेंट कर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का संचालन प्रो. ललित तिवारी एवं डॉ. रुचि मित्तल ने संयुक्त रूप से किया, जबकि डॉ. किरण तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। आयोजन समिति में डॉ. हरदेश शर्मा, डॉ. भूमिका प्रसाद, डॉ. मोहित सिंह रौतेला, डॉ. अविनाश जाटव, खुशबू और कृति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य लोगों ने बड़ी संख्या में सहभागिता की।

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