
गुरु सिंह सभा ने पुराने गेट खोलने या नया गेट बनाने की मांग उठाई, गोवर्धन हॉल समिति ने मुख्य द्वार के पास गेट से आवागमन प्रभावित होने की जताई आशंका
नैनीताल। गोवर्धन हॉल के मुख्य द्वार के समीप गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के लिए प्रस्तावित इमरजेंसी गेट को लेकर गुरुवार को विवाद की स्थिति पैदा हो गई। गेट के लिए लोक निर्माण विभाग की ओर से मेजरमेंट किए जाने के दौरान गुरुद्वारा सभा के पदाधिकारियों और नगरपालिकाध्यक्ष के बीच तीखी बहस हो गई। मामले में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी आपत्तियां और तर्क सामने रखे हैं।
गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के महासचिव अमनप्रीत सिंह ने बताया कि गुरुद्वारा परिसर के लिए करीब चार फीट चौड़े इमरजेंसी गेट का प्रस्ताव है और पीडब्ल्यूडी की ओर से इसका मेजरमेंट किया गया था। उनका कहना है कि गुरुद्वारा सभा का पहले से इमरजेंसी गेट था, जिसे सेवा समिति की ओर से बंद कर दिया गया। ऐसे में सभा की मांग है कि पुराने गेट को खोला जाए अथवा प्रस्तावित नया गेट बनाने दिया जाए।
अमनप्रीत सिंह ने कहा कि आपात स्थिति में गुरुद्वारा परिसर से सुरक्षित निकासी के लिए रास्ता होना जरूरी है। उन्होंने गोवर्धन हॉल में होने वाले कुछ आयोजनों को लेकर भी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि कार्यक्रमों के दौरान तेज आवाज में डीजे बजाने, शराब के सेवन तथा शराब की बोतलें और सिगरेट गुरुद्वारा परिसर में फेंके जाने जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं। उनका कहना है कि मंदिर और गुरुद्वारे के समीप इस प्रकार की गतिविधियां उचित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि शिकायतों का समाधान नहीं होने पर प्रशासन से शिकायत की जाएगी।
वहीं सेवा समिति गोवर्धन हॉल के उपाध्यक्ष दीपक गुरुरानी ने गुरुद्वारा परिसर के लिए प्रस्तावित गेट पर अलग पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि मुख्य द्वार के समीप गेट बनने से गोवर्धन हॉल में आने-जाने वाले लोगों के आवागमन में परेशानी उत्पन्न हो सकती है। उनका सुझाव है कि गुरुद्वारा परिसर का गेट दूसरी ओर बनाया जाए, ताकि दोनों परिसरों की व्यवस्था और आवागमन सुचारु बना रहे।
दीपक गुरुरानी ने कहा कि विवाद का समाधान आपसी बातचीत और सहमति से निकाला जा सकता है। उनका कहना है कि ऐसा रास्ता तलाशा जाना चाहिए जिससे गुरुद्वारा सभा की इमरजेंसी जरूरत भी पूरी हो और गोवर्धन हॉल में आने-जाने वाले लोगों को भी परेशानी का सामना न करना पड़े।
मामले में दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और संबंधित संस्थाएं आपसी सहमति से ऐसा समाधान निकाल पाती हैं या नहीं, जिससे इमरजेंसी व्यवस्था के साथ सार्वजनिक आवागमन भी प्रभावित न हो।
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